पर्वतीय प्रदेशों में आनेवाले संकट निरन्तर बढ़ते जा रहे हैं। प्रकृति अपना विराट रूप प्रदर्शित कर रही है। जन-सामान्य का जीवन इन आपदाओं के कारण निरन्तर अस्त-व्यस्त हो रहा है। विद्वान नवीन जीवन-शैली, तकनीक के विकास और असंतुलित दबाव को इन समस्याओं का कारण मानते हैं।
धरती के इस सौन्दर्य के प्रति मानव का आकर्षण तो स्वाभाविक है, परंतु इस आकर्षण को ही व्यावसायिक दृष्टि के धन-लोलुपों ने पर्यटन के माध्यम से अंधाधुंध भुनाना प्रारंभ कर दिया है। पर्यावरण पर जितनी बहसें की जा रही हैं, व्यावहारिकता अथवा वास्तविकता का उनसे कोई संबंध नहीं है।
आधुनिकता के नाम पर परंपरा को अंधविश्वास घोषित करने वाले भारतीय संस्कृति से पूर्णत: अनभिज्ञ हैं, अन्यथा वह इस सत्य को जान पाते कि हमारी प्रत्येक परंपरा के पीछे कोई न कोई वैज्ञानिक तथ्य अवश्य है। प्रकृति के प्रति भारतीयों का दृष्टिकोण संवेदनापूर्ण है। नदियों, पहाड़, वृक्ष इन सभी को हमारे समाज में पूजनीय माना गया है। फिर न जाने कब हम केवल भोक्ता बनकर रह गए।
आधुनिकता के नाम पर परंपरा को अंधविश्वास घोषित करनेवाले किससे अनभिज्ञ हैं?
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