आचरण का विकास जीवन का परमोद्देश्य है। आचरण के विकास के लिए नाना प्रकार की सामग्रियों का, जो संसार-संभूत शारीरिक, प्राकृतिक, मानसिक और आध्यात्मिक जीवन में वर्तमान है, उन सभी का किसी मनुष्य अथवा जाति के आचरण के विकास के संदर्भ में विचार किया जाना चाहिए।
आचरण के विकास के लिए जितने भी कर्म निर्धारित किए गए हैं, उन सभी को संघटनकर्ता धर्म का अंग मानना चाहिए। चाहे कोई कितना भी बड़ा महात्मा हो जाए, वह निश्चयपूर्वक यह नहीं बता सकता कि यही रास्ता सही है, दूसरा नहीं। आचरण को बेहतर बनाने के लिए सभी को एक ही पथ नहीं बताया जा सकता।
आचरणशील महात्मा स्वयं तो किसी बनी-बनाई सड़क से नहीं आया, उसने भी अपनी सड़क स्वयं बनायी थी। हर किसी को अपने देश-काल के अनुसार राम-प्राप्ति की इच्छा रखते हुए अपनी नैया खुद ही बनानी होगी और अपने आप ही चलानी भी होगी।
प्राकृतिक सभ्यता के आने पर ही मानसिक सभ्यता आती है और मानसिक सभ्यता के आने पर आचरण सभ्य बनता है।
उपर्युक्त अनुच्छेद के अनुसार आचरण को बेहतर बनाने के लिए क्या किया जाना चाहिए?
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