आख्यान को कैसे आगे ले जाया जाए, ऐसे प्रश्नों के नैरन्तर्य से ही कोई आख्यान बुना जाता है। किसी सभ्यता में, बल्कि किसी भी भाषिक संस्कृति में, आख्यान को आगे बढ़ाने के कितने और कैसे विकल्प उत्पन्न हो सकते हैं, इसी से उस सभ्यता की सृजनात्मक समृद्धि आंकी जा सकती है।
जब भी कोई लेखक ऐसे किसी प्रश्न पर आ ठिठकता है तब उसकी कल्पनाशीलता कहाँ कहाँ तक और किस तरह से जा सकती है, वह कितनी उड़ान भर सकती है, इसकी एक अदृश्य मर्यादा हर भाषा के रेशों के भीतर ही स्पन्दित होती रहती है। उस मर्यादा की बहुलता ही किसी भाषिक संस्कृति की शक्ति होती है।
तभी वाल्मीकि ने नल नामक वानर सैनिक को शिल्पकर्ता विश्वकर्मा के वरदान से युक्त किया होगा। पहले वाल्मीकि इस पर रुके होंगे, लेकिन फिर इस रास्ते उन्होंने समुद्र पर सेतुबन्ध करने का निश्चय किया होगा। इस तरह राम, वानर सेना और रामकथा को आगे ले जाने के लिए नल के दैवीय कौशल के सहारे वाल्मीकि ने समुद्र की विराट जलराशि पर सौ योजन का सेतु बनाकर तैयार किया होगा। संयोग से यही पुल गोस्वामी तुलसीदास को ऐसा मालूम दिया होगा, मानो वह तैर रहा हो।
लेखक के अनुसार किसी सभ्यता की सृजनात्मक समृद्धि कैसे आंकी जा सकती है?
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