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सुधारकों को जानना चाहिए कि लोग केवल लेखन से नहीं, बल्कि प्रामाणिक जीवन से प्रभावित होते हैं। लोकमान्य तिलक और अन्य सुधारकों ने जो अखबार और पत्रिकाएं निकालीं, जो पुस्तकें उन्होंने लिखीं, वे कम बिकीं, किन्तु उनका अतिशय प्रभाव हुआ। उनका लेखन, उनके असाधारण जीवन का विस्तार और उसे प्रतिबिम्बित करने वाला माना जाता था।

यह उनके जीवन की प्रामाणिकता थी, जिसने उनके संदेश, उनके उदाहरण को बल प्रदान किया। वे सभी जानते थे कि उनके जीवन संपूर्णता में एकनिष्ठ थे, वे सार्वजनिक जीवन में नैतिक तथा व्यक्तिगत जीवन में विलासी नहीं थे, न इसका उल्टा सही था। वे एक मंदिर की चारदीवारी में शुद्ध विचारों और पवित्र संकल्पों से परिपूर्ण नहीं थे।

एक लेखक जो महज अपने पाठकों का मनोरंजन कर रहा है, यहां तक कि वह जो केवल उन्हें सूचित कर रहा है, अपने बाकी जीवन में अपनी मनमर्जी से कुछ भी कर सकता है। किन्तु सार्वजनिक जीवन में सुधार के लिए अपनी लेखनी का उपयोग करने वाला लेखक ऐसे दोहरे मानदंड नहीं अपना सकता है।

यहाँ एक महान व्यक्ति का अन्य के प्रभाव के बारे में, लोकमान्य तिलक का, साक्ष्य प्रस्तुत है : मेरा विश्वास है कि एक संपादक, जिसके पास कहने को महत्वपूर्ण बात है तथा जिसके पास पाठकवर्ग/अनुयायी हैं, उसे आसानी से चुप नहीं कराया जा सकता है। उन्होंने अपना पूर्ण संदेश कारावास में डाले जाने के शीघ्र पश्चात् प्रस्तुत किया। लोकमान्य मुद्रित केसरी के स्तंभों की बजाए मांडले के किले से अधिक पुरजोर तरीके से बोले।

तिलक के लेखन किस कारण से प्रभावी बने थे?

Aवे चिंतनपरक थे तथा सही अर्थों में उनके असाधारण जीवन को निरूपित करते थे ✓ Correct
Bवे सूचना से परिपूर्ण थे
Cवे आलोचक थे
Dउनमें सुंदर शब्दांशों और कहावतों का उपयोग हुआ।
Correct answer: (A) वे चिंतनपरक थे तथा सही अर्थों में उनके असाधारण जीवन को निरूपित करते थे
Explanation

गद्यांश कहता है कि लेखन असाधारण जीवन का विस्तार था और उसे प्रतिबिम्बित करता था, और यही प्रामाणिकता शब्दों को बल देती थी, अतः लेखन इसलिए प्रभावी था क्योंकि वह चिंतनपरक था और उनके असाधारण जीवन को सही अर्थों में निरूपित करता था।

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