व्यक्ति सम्बन्ध हीन सिद्धान्त मार्ग निश्चयात्मिका बुद्धि को चाहे शान्त करे, पर प्रवर्तक मन को मनोरंजनकारी तभी लगते हैं, जब वे किसी व्यक्ति के जीवन क्रम के रूप में देखे जाते हैं।
शील की विभूतियाँ अनन्त रूपों में दिखाई पड़ती हैं। मनुष्य जाति ने इन रूपों को महात्माओं के आचरणों और चरित्र संबंधी पुस्तकों में देखा है। जब इन रूपों पर मनुष्य मोहित होता है, तब वह सात्विक शील की ओर आप से आप आकर्षित होता है। शून्य सिद्धान्त वाक्यों में कोई आकर्षण शक्ति या प्रवृत्तिकारिणी क्षमता नहीं होती।
गुण प्रत्यक्ष नहीं होता, उसके आश्रय और परिणाम प्रत्यक्ष होते हैं। मानव जीवन के बीच हम इस गुण या शील के सौन्दर्य का विकास देखना चाहते हैं। अनुभावात्मक मन को आकर्षित करने वाले विषय होते हैं।
अनुभूति पर ही प्रवृत्ति और निवृत्ति निर्भर है। अनुभूति मन की पहली क्रिया है और संकल्प विकल्प दूसरी। सत्तोन्मुख प्राणियों के लिए ऐसे पथिकों के सामीप्य लाभ की कामना करना स्वाभाविक है, जो सत्पथ के दीपक हैं।
मानव-जीवन के बीच हम किस सौन्दर्य का विकास देखना चाहते हैं?
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