प्राचीन और मध्यकालीन आर्य भाषाओं संस्कृत, प्राकृत, अपभ्रंश का क्षेत्र सार्वदेशिक था। जिस रूप में वे उपलब्ध हैं उस रूप में उनका व्याकरणिक ढाँचा भी अलग है। इन भाषाओं में प्रादेशिक निष्ठा नहीं थी, किन्तु जातीय भाषाओं में यह निष्ठा बढ़ी।
संस्कृत से प्राकृत, प्राकृत से अपभ्रंश और अपभ्रंश से उत्तर भारत की आधुनिक आर्य भाषाओं का विकास हुआ। ऐसा विश्वास किया जाता रहा है और इसके लिये सिद्धान्त भी गढ़े गये हैं।
किन्तु जातीय भाषाओं ने संस्कृत और अपभ्रंश से बहुत कुछ लिया है। हिन्दी ने उनकी विरासत को सबसे अधिक ग्रहण किया, विशेष रूप से अपभ्रंश की विरासत को।
शब्द समूह, उच्चारण तथा व्याकरणिक ढाँचे के अलग होने से अपभ्रंश साहित्य को हिन्दी साहित्य का अंग नहीं माना जा सकता। किन्तु सांस्कृतिक नैरन्तर्य के लिये उसका अध्ययन आवश्यक है।
अवतरण के अनुसार जातीय भाषा के रूप में आज किस भाषा को मान्यता प्राप्त है?
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