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'ध्रुवस्वामिनी' नाटक में ध्रुवस्वामिनी के संवादों को पहले से बाद के क्रम में लगाएँ:

1.लौट जाओ, इस तुच्छ नारी-जीवन के लिए इतने महान उत्सर्ग की आवश्यकता नहीं।
2.चन्द्रे! तुम मुझे दोनों ओर से नष्ट न करो। यहाँ से लौट जाने पर भी क्या मैं गुप्तकुल के अन्तःपुर में रहने पाऊँगी?
3.तो फिर मेरा और तुम्हारा जीवन-मरण साथ ही होगा।
4.चन्द्रे! मेरे भाग्य के आकाश में धूमकेतु-सी अपनी गति बंद करो।
5.अपनी कामना की वस्तु न पाकर यह आत्महत्या जैसा प्रसंग तो नहीं है।
A1, 2, 4, 5, 3
B1, 5, 2, 4, 3
C2, 5, 1, 3, 4
D2, 1, 5, 4, 3
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