आनन्दवर्धन से पूर्व 'अलंकार' को काव्य का सर्वस्व और 'रीति' को काव्य की आत्मा के रूप में घोषित किया जा चुका था। अपने मत की पुष्टि के लिए आनन्दवर्धन ने लक्षणा शब्दशक्ति के अतिरिक्त इन दोनों तत्वों (अलंकार और रीति) का भी खण्डन किया। पहले अलंकार-तत्व को लीजिए। भामह आदि अलंकारवादियों के समर्थकों की ओर से कहा जा सकता है कि 'अलंकार' नामक तत्व की स्वीकृति किये जाने पर 'ध्वनि' नामक तत्व की आवश्यकता ही नहीं है, क्योंकि भामह-प्रस्तुत प्रतिवस्तूपमा, दण्डि-प्रस्तुत व्यतिरेक तथा भामह, दण्डी और उद्भट द्वारा प्रस्तुत पर्यायोक्ति आदि अलंकारों में ध्वनि-तत्व के स्पष्ट संकेत मिल जाते हैं।
इसी प्रकार अलंकार-व्यंग्य को भी 'ध्वनि' न मान कर 'अलंकार' ही माना जा सकता है। आनन्दवर्धन ने इनका खण्डन प्रस्तुत करते हुए कहा है कि उक्त प्रतिवस्तूपमा आदि अलंकारों में 'व्यंग्यार्थ' की प्रतीति होने पर भी इसका कथन प्रधान रूप से नहीं होता, उनमें प्रधान चमत्कार अलंकार-तत्व का ही रहता है। अत: इन्हें 'ध्वनि' न कहकर अलंकार कहना चाहिए।
हाँ, व्यंग्यांश-समन्वित इन पर्यायोक्ति आदि अलंकारों का चमत्कार अन्य वाच्यालंकारों उपमा, रूपक आदि की तुलना में कहीं अधिक बढ़ जाता है। और यदि कहीं इन अलंकारों के उदाहरणों में व्यंग्यार्थ की प्रधानता हो भी, तो उन्हें इन अलंकारों के स्थान पर 'ध्वनि' का ही उदाहरण माना जायेगा। आनन्दवर्धन के अनुसार ध्वनि अंगी है और अलंकार, गुण तथा वृत्तियाँ उसके अंग हैं।
गद्यांश के अनुसार व्यंग्यांश-समन्वित होने से किस अलंकार का चमत्कार अधिक बढ़ जाता है?
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