विद्यार्थी विविध परिस्थितियों में प्रभावी ढंग से सामना करने की अपनी क्षमता के बारे में सकारात्मक या नकारात्मक विश्वास विकसित कर सकते हैं। इसे कहा जा सकता है
विविध परिस्थितियों में प्रभावी ढंग से सामना करने की अपनी क्षमता के बारे में अधिगमकर्ता का सकारात्मक या नकारात्मक विश्वास स्व-प्रभावकारिता है।
यह इस निर्णय से जुड़ी है कि व्यक्ति क्या कर सकता है, और यह प्रयास, दृढ़ता व कार्य-चयन को गढ़ती है।
आत्म-नियमन अपने विचारों, भावों और कर्मों को लक्ष्यों की ओर वास्तव में संचालित करना है, क्षमता के बारे में विश्वास नहीं।
अहं, फ्रॉयड के अनुसार, व्यक्तित्व का यथार्थ-उन्मुख भाग है, जो इस दक्षता-विश्वास से असंबद्ध है।
आत्म-विश्वास एक व्यापक, सामान्य आश्वस्ति-भाव है, जबकि स्व-प्रभावकारिता कार्य- और स्थिति-विशिष्ट होती है।
अल्बर्ट बांडुरा ने 1977 में अपने सामाजिक संज्ञानात्मक सिद्धांत के भीतर स्व-प्रभावकारिता की संकल्पना दी।
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