श्रद्धा द्वारा हम दूसरे के महत्त्व के किसी अंश के अधिकारी नहीं हो सकते, पर भक्ति द्वारा हो सकते हैं। श्रद्धालु महत्व को स्वीकार करता है, पर भक्त महत्व की ओर अग्रसर होता है। श्रद्धालु अपने जीवन क्रम को ज्यों का त्यों छोड़ता है, पर भक्त उसकी काट छाँट में लग जाता है।
अपने आचरण द्वारा दूसरों की भक्ति के अधिकारी संसार के अन्य प्राणियों की भक्ति साधना में समर्थ हुए हैं। गुरु गोविन्द सिंह को यदि केवल दण्डवत करने वाले और गद्दी पर भेंट चढ़ाने वाले श्रद्धालु ही मिलते, दिन रात साथ रहने वाले अपने सारे जीवन को अर्पित करने वाले भक्त उन्हें अन्याय के दमन में कभी न मिलते।
इससे भक्ति के सामाजिक महत्व को, इसकी लोक हितकारिणी शक्ति को स्वीकार करने में किसी को आगा पीछा नहीं करना चाहिए। सामाजिक महत्व के लिए आवश्यक है कि या तो आप दूसरों को आकर्षित करें या आप दूसरों के लिए आकर्षित हों। जैसे इस आकर्षण विधान के बिना अणुओं द्वारा व्यक्त पिण्डों का आविर्भाव नहीं हो सकता, वैसे ही मानव जीवन की विशद अभिव्यक्ति संभव नहीं।
भक्ति के सामाजिक महत्व का अभिप्राय है:
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