शासन की पहुँच प्रवृत्ति और निवृत्ति की बाहरी व्यवस्था तक होती है। उनके मूल में उनकी गति नहीं होती। भीतरी या सच्ची प्रवृत्ति और निवृत्ति को जागृत रखने वाली शक्ति कविता है, जो धर्मक्षेत्र में शक्ति भावना को जगाती है।
भक्ति धर्म की रसात्मक अनुभूति है। अपने मंगल और लोक के मंगल का संगम उसी के भीतर दिखाई पड़ता है। इस संगम के लिए प्रकृति के क्षेत्र में मनुष्य को अपने हृदय के प्रसाद का अभ्यास करना चाहिए।
जिस प्रकार ज्ञान नरसत्ता के प्रसार के लिए है, उसी प्रकार हृदय भी है। रागात्मक वृत्ति के प्रसार के बिना विश्व के साथ जीवन का प्राकृत सामंजस्य घटित नहीं हो सकता।
जब मनुष्य के सुख और आनंद का मेल शेष प्रकृति के सुख सौंदर्य के साथ हो जायेगा, जब उसकी रक्षा का भाव तृणगुल्म, वृक्ष लता, पशु पक्षी और कीट पतंग सब की रक्षा के भाव के साथ समन्वित हो जायेगा, तब मनुष्य अपने अवतार का उद्देश्य पूर्ण कर लेगा और वह जगत का सच्चा प्रतिनिधि हो जायेगा।
जीवन का प्राकृतिक सामंजस्य विश्व के साथ स्थापित करने के लिए आवश्यक है:
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