कलियुग सब युगों में अच्छा है, क्योंकि इसमें मानस-पाप का कुछ फल नहीं होता, किंतु मानस-पुण्य का पूरा फल मिलता है। राम का नाम राम से भी बड़ा है, भव की कोई जरूरत नहीं है।
योग ने गृहस्थ को जरूरत से ज्यादा संशयालु बना दिया था, भक्ति ने पूरा आशावादी। एक ने मुक्ति को महँगा सौदा बना दिया, दूसरे ने बहुत सस्ता।
योग में गलदश्रु भावुकता को कोई स्थान नहीं है, जो भक्ति पद-पद पर भक्त को कंप, आवेग, जड़ता और रोमोद्गम की अवस्था में ले आती है, वह इस क्षेत्र में अपरिचित थी।
परम तत्व विभाग और अविभाग से परे है, सूक्ष्म और स्थूल के अतीत है। यदि वे एक-रस हैं, समरस हैं तो फिर रोने से होता क्या है।
अवतरण के अनुसार परम तत्त्व क्या है?
Aवह अखण्ड चैतन्य स्वरूप है
Bवह विभाग-अविभाग से परे है
Cवह गुणहीन-आकारहीन है
Dवह मायातीत है
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