सर्वोदय गांधी का सामाजिक आदर्श है। सर्वोदय का अर्थ है सबकी उन्नति और उसका ध्येय है, हृदय परिवर्तन। हृदय परिवर्तन अन्यायी, शोषक और अत्याचारी का। गांधीवाद के मूल स्तम्भ दो हैं, सत्य और अहिंसा। सत्य का ही दूसरा नाम उन्होंने परमेश्वर माना है तथा समस्त सृष्टि में एक ही तत्त्व की व्याप्ति स्वीकार कर ईश्वर और मनुष्य तथा मनुष्य और अन्य जीवधारियों की एकता स्वीकार की है। अहिंसा में केवल द्वेष का अभाव ही नहीं, प्रेम की संप्राप्ति भी है। यह प्रेम स्वार्थ, मोह, आसक्ति आदि से भिन्न होता है। इस अहिंसा में बैर-त्याग, चराचर प्रेम और पूर्ण निष्काम भाव का समन्वय है। इस समन्वय का पहला तत्त्व जैन, बौद्ध अहिंसा का है, दूसरा वैष्णव भावना का प्रसाद है और तीसरा तो स्पष्टतः गीता का प्रभाव है। ऐसी अहिंसा की प्राप्ति के लिए गांधी ने आत्मशुद्धि को आवश्यक माना है और आत्मशुद्धि के लिए अन्य संतों की भांति अहं के त्याग को अनिवार्य माना है।
इस तरह गांधी के जीवनदर्शन में त्याग और तप का प्राधान्य है तथा भोग और आनंद का तिरस्कार। कला में भी उन्होंने शिव और सत्य पर ही बल दिया, सुन्दर को उन्होंने इन दोनों से या तो अभिन्न माना या अस्वीकार किया।
इसी कारण 'कला कला के लिए' जैसे सिद्धांतों के प्रति गांधी-दर्शन में कोई सहानुभूति नहीं मिलती। अस्तु कला कुछ लोगों के अधिपन में ही न रहे, उसकी अपील सार्वभौम हो, तभी वह प्रकृति के सन्निकट पहुँच सकेगी, यह गांधी जी का आग्रह था। कलाकार जनता के प्रति अपने कर्तव्यों के विषय में सदैव जागरुक रहे, तभी कला अपनी सार्थकता प्रमाणित कर सकती है। कला की श्रेष्ठता की कसौटी गांधी ने उसकी उपयोगिता स्वीकार की। 'कला का सम्बन्ध नीति, हितकारिता और उपयोगिता से नहीं है, केवल सौन्दर्य से है' - यह कहना सौन्दर्य और कला को न समझने जैसा है। सत्य ही ऊँची से ऊँची कला और श्रेष्ठ सौन्दर्य है और वह नीति, हितकारिता और उपयोगिता से भिन्न नहीं हो सकता। गांधी के अनुसार संगीत इसलिए श्रेष्ठ है कि वह प्रार्थना और नैतिक उन्नति में सहायक है।
उपर्युक्त अवतरण के आधार पर अहिंसा के संबंध में उपयुक्त विचार कौन सा है?
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